इश्क़ इबादत (IshQ Ibaadat)
हज़ारों चेहरों के दरमियाँ… इंसाँइक सगा होता है। बनकर ख़ास… जो दिल की बस्ती मेंपनाह लेता है। कैसे… दिल-ए-ख़ामोशमहल सपनों […]
हज़ारों चेहरों के दरमियाँ… इंसाँइक सगा होता है। बनकर ख़ास… जो दिल की बस्ती मेंपनाह लेता है। कैसे… दिल-ए-ख़ामोशमहल सपनों […]
हंसकर यूँ ज़ज़्बात छुपाते क्यूँ होअंदाज़ की तल्खी को दबाते क्यूँ होखफा हो तुम जो तो कह दो हमसेयूँ नज़र
कोशिशें तमाम बेकार हुईंजेहन की पशोपेश मगर हार हुईख़्वाबों को बेइंतेहा दौड़ायाहुनर चुन चुन लफ्ज़ ले लायाकोई तक़रीर न उतरी
फलक से तारे लाना चाहता हूँ तुम्हें मंज़ूर हो तोचाँद पर घर बनाना चाहता हूँ अगर मंज़ूर हो तो तुम्हारे
ज़ुल्म का अत्याचारकरता जाता नरसंघाररोता विश्व ज़ार ज़ारसरकारें भी लाचारचहुँओर हाहाकारघोर चीख पुकारसर होता खून सवार सिस्टम लाचारव्यर्थ कानूनी तक़रारमातृ
मौत ने फिर चाल चली कोई गुज़र गयाएक और बेचारा हसरतों पे हो क़ुर्बां गया चाँद छूने के तो नहीं
छोटी खुशियों में ज़ज़्ब बड़ी बातें हैंअपनों से मिला करतीं ढेर सौगातें हैंखुशियों का टोकरा हम भर लाते हैंखुशियां बांटते
माफ़िक़ न सही हर रिश्ता निभाया है हमनेगैर ज़माना हुआ मगर साथ निभाया है हमने आसान राहों से लोग छुआ
भारत की बेटी ये है भारत की बेटीभाग्य देखो कैसे कैसे लाती है बेटी लाल बत्ती पर फटे मैले कपड़ों
किसने फेंका है ठहरे पानी में पत्थरहवा को बांधने की ज़ुर्रत की हैकौन उजाड़ रहा है घरोंदे चिड़ियों केपरिंदों को
बदहवास दौड़ती फिर रही है ज़िन्दगीधुआं धुआं गर्द सिमटती शहरवालों में आदमी ही आदमी मिलते हैं दुकानों मेंआदमी से आदमी
मंज़िल है दूर तन्हा सफर जीत होगी कलपेश आएगी मुश्किल ज़रा संभलकर चल माना कि फेर ली हैं सब अपनों
बड़ा अनोखा अंक है दोएक और एक बनाएं दोदो के बीच जो तीजा आयेकिस्सा खत्म हुआ समझो दिन हैं चक्की
सुनो आज ‘एक’ की महिमावृहद् अनोखा इसका ज्ञानअंक नहीं यह केवल ‘एक’गाथा है अत्यंत महान एक है ईश्वर वही साध्य
तुम आये जो करीब मिलते हैं लोग अदब सेहाथों में है हाथ अब डरते हैं सिर्फ रब से अक्सर बिना
घडी भर को सुनो गोरी मेरे पहलू में आनाअपने मम्मी डैडी से ज़रा बच बच के आनातू भी खुद को
सुबह से मन उदास है माँ नहीं है पासचली गयी है वो किसी दुसरे जहान मेंबादलों के पार बन के
सज्जन सत्य को जीवन का सिद्धांत बना लेते हैंउत्कृष्ट चरित्र से खुद की पहचान बना लेते हैंअगली पीढ़ी को भी
स्वप्न नहीं वे जो मनुष्य को नीदों में दिखते हैं स्वप्न तो वे हैं जो आँखों से नींद उड़ा देते
क्यों हो खामोश क्यों इतने हैरां होक्यों हो जैसे अजनबी कुछ तो कहोक्या ग़लत हुआ है क्या बदल गया हैकसम