धड़क (Dhadak)
पर्दानशीं हुए खूबसूरत चेहरे सभीअब नज़र हुस्न पर ठहर पाती नहींदिले दर पे कोई दस्तक होती नहींअब धड़क धड़कनों को […]
पर्दानशीं हुए खूबसूरत चेहरे सभीअब नज़र हुस्न पर ठहर पाती नहींदिले दर पे कोई दस्तक होती नहींअब धड़क धड़कनों को […]
कसम है बेटी माँ के रस्ते पर ही तुमको चलना हैबीवी बन कर मर्दों से गिन गिन कर बदले लेना
तेरे बिना शाम काटे न कटेये रातें भी अब धुंधली लगेंतेरे बिना हर खुशी अधूरीलगे जैसे दुनिया छोड़ दें तेरा
तेरा नाम लेकरतुझे हाज़िर रखकरख्वाहिश का बीजहमने दिल में बो दिया सपनों की कश्तीहवाओं में तैरेदिल की बातेंतेरे आगे खोल
हम मैसेज कर देते हैं गोया वो पढ़ भी लेते हैंआरज़ू है मगर आएं नज़र वो कभी टाउन मेंउम्र दराज
उमंग थी तरंग थीमलंग थी मैं संग थीजब डोर तेरे हाथ थीमैं उड़ती पतंग थी अब न संग तू बेरंगसब
आवारा बादलचाँद को कुछ देर ढक करअपने वज़ूद का गुरूरजरूर कर सकते हैचाँद की चमक कोकम तो नहीं मेरी वफ़ा
न बोले तुम न मैंने कुछ कहाआँखों ने आँखों से जाने क्या कह दियातुम खुले मैं भी खिलने लगादिल ही
हम तनहा खुद में समाये थेदूर हमसे हमारे ही साये थेसूने मन में फिर तुम आयेकई वादे अपने संग लायेकई
अक्लमंद है शक्ल से मासूम नज़र आता हैयूँ वो शख्स हर बार ज़माने से छला जाता है पहली मुलाकात में
शरद पूर्णिमा की रात है हम तन्हा छत परपूरा चाँद आसमां पे है और चांदनी छत परयाद आतीं हैं रातें
दिल को समझाने को मेरी जान ख्याल अच्छा हैकविता में पिरोकर तालियां बजवाने के लिए अच्छा है तुम्हारी ऊंची उड़ान
तुम को भी अच्छा लगता थाआनंद हमको भी आता थादो नैनों का मिलन प्रियेमन व्याकुल कर जाता था वक्त ने
बड़े लोगों में बड़ी देखी कोई बात नहींयूँ बिखर जाएँ हम वर्ना ऐसे हालात नहीं पैसे वाले हैं अमीरी का
ख्वामखां ही किसी से उलझते नहींमन किसी से भी मैला रखते नहींसाफ़ दिल है खरी बात करते हैं हमसिर्फ अपने
कल की बारिश में हुई एक शरारत ने फिरदिल के वीरां तसव्वुर को आबाद कियाटूटी छतरी लिए बूंदों में भीगतीएक
चाँद आज कुछ ठीक थाचांदनी के संग घर में मौजूद थाचेहरे पर चोटों के निशान लिएमायूस बैठा था मगर ठीक
ये जो तेरी ज़ुल्फ़ बारहा पेशानी पर आ गिरती हैमालूम होता है गिलहरी कोई दाना तलाशती है मिल जाती हैं
‘कल्पना’अब बड़ी हो गयी हैबचपन से ही उसेबड़े लाड प्यार से पाला है वह अगर गिर जाती या फिरज़रा सी
जिस्म में एक सौ छह हड्डियां एकसाथ टूटने का दर्द मैं नहीं जानता मगरदो सौ सत्तर रातें अनजाने किसी डर