अलविदा (Alvida)
कुछ चलता है मन के भीतरज़ज़्बात हिलोरें लेते हैंकुछ क़दमों को है खींच रहाजब तुम से विदा हम लेते हैं […]
कुछ चलता है मन के भीतरज़ज़्बात हिलोरें लेते हैंकुछ क़दमों को है खींच रहाजब तुम से विदा हम लेते हैं […]
आईना हूँ में तेराहर अदा को तेरी देखा हैकौन देखेगा इतना तुझेजितना मैंने देखा है इतना कौन संवारेगाजितना मैंने संवारा
याद है तुमको छत पे तुम्हारीमैंने एक कागज़ फेंका थातुम अपनी छत पर बैठी थीमैं मुंडेर पर लेटा था दोपहर
बरात समय पर ले आना कलबरात समय पर ले आनामेरे मम्मी डैडी का एवैं,बीपी नहीं बढ़ानाअपना वायदा निभानाबरात समय पर
आदम जंगल में घूमा करता था यहाँ वहांपैरों के नीचे ज़मीन थी था ऊपर आसमां बोलने को जुबां पर था
कॉलोनी में डोगिन ने पांच बच्चों को जन्म दियादर्द लिया दर्द सहा उसने मगर उफ़ नहीं किया पड़ौस की आंटी
आ गोरी चल छत पर आ मैं कन्नी दूं तू पतंग उड़ामांजा चरखी सब दे दूंगा तू आजा बस पेंच
तुझसे बढ़कर मेरा कोई महबूब नहींतेरे बिना ऐ मेरे ख़ुदा मेरा वजूद नहींतेरे ही हाथों में क़ाबिज़ मेरी लगाम हैतेरे
तुझमें में खुदा हैमुझ में खुदा हैतेरे खुदा से जोमेरा दिल लगा हैतेरे खुदा कोजो मैंने अपना बनाया हैदुनिया ने
मेरी राह में जिस जिसने कांटे बिछाए थेवो पलकों से चुन चुनकर सब हटाए हैंऊपरवाले का करम है मुझे क्या
एक पुरानी तस्वीर में जकड़े तुम और हमधुंधली सी यादों में सिमटे हैं धुंधले से हमजब बंधन में बंधे थे
आशिक में आवारा हूँ गोया मैंने माना किब्यूटीफुल है तू छुने की बड़ी तमन्ना थीचांटा जड़ दिया मेरे गाल पर
जो बात अधूरी थी छोड़ीवो बात हमें बतला जाओ सुनते सुनते मैं कह भी गयाकहते कहते तुम सुन न सकेदिल
इससे पहले कि तुम कुछ सोचो कुछ सोचो और कुछ न बोलोइससे पहले कि लोग कुछ बोलें उनकी बातों से
कानों में आई आवाज ‘वो लड़की’मासूमियत का वो क़त्ल कर गयी बढ़ती उमर थी बुद्धि भी जड़ थीखाली दिमाग शैतान
न आग न चिंगारी न धुंआज़िन्दगी में खेल ये क्या हुआन ही उलझन न दर्द है मुआदिल बता मैं मर
क्या तुम्हें याद होगा की कोई इतना तुम्हें चाहता हैदिन रात जागते सोते बस ख्वाब तुम्हारे देखता है बैठे होते
A Girl Called Anonymous I love my college…More than words can say. Not because of classrooms.Not because of books. Because
तेरी फुर्सत से सराबोर होने लगे हैंइतने तन्हा हैं कि बोर होने लगे हैं जब से गए हो तुम हमें
रेलगाड़ी की खिड़की से बाहर जो देखावक्त रात का था हर ओर पसरा अँधेरा मैंने नज़र दौड़ाई तो चाँद नज़र