लाहौल वला कूव्वत
सदक़े ऐ अनजानी रूह इंसां को डरा दियामंगल विजयी को तूने घर में पनाह दिया भागा फिरता था मतवाला अनजाने […]
सदक़े ऐ अनजानी रूह इंसां को डरा दियामंगल विजयी को तूने घर में पनाह दिया भागा फिरता था मतवाला अनजाने […]
खुद भूखी है परवाह नहींपरिवार को पहले खिलाती हैबच्चों की ख़ुशी में खुश होतीदुःख अपना नहीं बताती है सबसे जल्दी
पावक दहकी क्षितिज क्षितिज मेंग्रीष्म ऋतू आयी यौवन परउष्मायी धरती निज उर मेंपावक दहकी क्षितिज क्षितिज में कुंदन बदन दमकती
खबर छपी थी शहीद के परिवार के लिए एक भिखारिन ने जुटाए छः लाख मांगकर भीख यह भावना है विडम्बना
गांव में मचा कोलाहल अखबारों में बनी सुर्खियांटीवी पर हुए चर्चे तमाम और बांटी गयीं बर्फियाँ फौजी का जंग में
तारीफों के पुल पर मुझको कितना रोज़ चढ़ाते होपरिचय मुझसे मेरा तुम हर दिन नया कराते होसुध बुध खो जाती
माँ मुझ पर उपकार तुम्हारा जग में जो मुझको लाईममता की छाया में रखकर दुनिया मेरी स्वर्ग बनाईबस इतनी अभिलाषाहै
मैले कुचले से कपड़ों मेंस्वेदग्रस्त हो यह प्राणीजीवन है संघर्ष सिखातारिक्शेवाला सीख पुरानी रुपये चंद कमाने कोघर बार छोड़ कर
यह ज़मीं भी न थी न था आसमान येन दरिया समंदर खूबसूरत जहाँ येन इंन्सां की हस्ती न जंगल जिनावरबला
वक्त है बदल रहा और रास्ते अनजानपुकारता हूँ तुम्हें कि बानगी मिलती रहेमंज़िलों की राह पर कारवाँ बढ़ते चलेंदीप मैं
व्यर्थ के तानों को सुनकर न हो जाना मायूस नहींजतन कोई न समझे मेहनत का गुणगान नहींसौंप दिया परिवार को
माँ मैं तुझको मिल न पाया कैसी है जान न पायाआखिर किस डर की खातिर मुझको मार गिराया! मैं तो
मेरे प्यारे बच्चे गुनहगार मैं तेराबिना सोचे समझे तुझे दुनिया में लायायह दुनिया जो नफरत की शै पर टिकी हैपसरा
गरीब किसान का बेटा था मेरा भी परिवार थामजबूरी में बचपन बीता कर्जे में घर बार था दो बहनों का
हमारा प्यारा देश भारत भारत का तिरंगा प्यारासुन्दर रूप इसका बड़ा प्यारा लगता हैभिन्न धर्म भिन्न भाषा भिन्न सबकी वेशभूषासदियों
होगा तू कहीं का आतंकी जो भी हो मंसूबा तेराकायर की तरह छिपकर चोरी से आता क्या ईमान तेरा रात
मैं हूँ भारत माता मेरे बच्चे कई करोड़ये हैं मेरी ताक़त रोकेंगे हर हमला आज भले हों नशे में सोयेखुदगर्जी
अनरवत बहती दुनिया मेंएक अमिट छाप अपनी भी होइतिहास के पन्नों में दाखिलकुछ भले कार्य अपने भी हों वह जीवन
कई कमरों का घर रहते जिसमें थे हम और बाबूजीकठिन परिश्रम से सींचा करते जिसको माँ बाबूजी अंतिम दौर में
हरे भरे गुलशन में देखो नित नए नए से रंग दिखेंकुछ कलियाँ फूलों बनें और फूल फलों में बदले सबके