तुम कहती हो..
तुम कहती हो —WhatsApp है मगर में देखती नहींअक्सर कह देती हो—“मैं तो WhatsApp देखती ही नहीं,”कि जैसे कोई ताज […]
तुम कहती हो —WhatsApp है मगर में देखती नहींअक्सर कह देती हो—“मैं तो WhatsApp देखती ही नहीं,”कि जैसे कोई ताज […]
सभ्यताएँ वो तबाह हुईंजब सब मिलजुल बैठा करते थे,सुख-दुख में रहते साथघर एक-दूजे के जाया करते थे। शादी-ब्याह, जन्मदिन होया
पुरानी तस्वीर की डीपी लगाए बैठा हूँ,बुढ़ापे से इस तरह मुँह छुपाए बैठा हूँ।जवानी छोड़ गई है दामन कब का,जवाँ
आज फनिवार है दिल्ली को खुमार हैछुट्टी है आराम कर रही चिंता न विकार है पांच दिन दोड़ी है दिल्लीजैसे
“आठ बजे की मेट्रो प्यारे, जब जब तुझको ले जायेगी…धिक्चिक धिक्चिक धिक्चिक धिक्चिक धिक्चिक धिक्चिक ले जायेगी…” “मौजपुर की ओर
लगा था कि शायदमैं भूल गया हूँ तुमको,लगा था कि तुम चले गए होऔर लौटकर नहीं आओगे। दिल मेंएक अजीब-सा
मैं वही हूँ, सब कुछ पहले जैसा हीबस समय बदल गया—अब वैसा नहींवो जादूगर कहीं दफ़न हो गया हैहाथों का
“हाँ… आजकल ऐसा ही है।” वह यूँ ही बात कर रहा था—किसी विषय पर,किसी मित्र से। मैं उसे जानता नहीं
ऐ गांधी तेरी टोपी कहाँ गईखुद पहनते हो न गैर कोईआज दिल में ख़याल आयाखाली मन में शैतान आया अपने
तुम पर मैं क्या गुज़रा हूँमैं तो खुद से ही गुज़रा हूँजो एक पल को ठहरा थाजाता हुआ मैं वो
घर में सब लेकिन हम तन्हा और बस हैं दीवारेंशब्द निठल्ले घूमते हैं कोई नहीं जिसे पुकारेंघर हो गया कैदखाना
मार्टिन सूंघे हुए मच्छर की तरह पड़ेन जूनून है न तो जूं जो कानों पर रेंगेन शर्म है हमें और
छोटे सुन, ओ छोटे छोटेभाई सुन, ओ छोटे छोटेछोटे सुन, ओ छोटे छोटेभाई सुन, ओ छोटे छोटे छोटे सुन तू
आज मैं खुद से मिलाजहाँ मैं रहा करता हूँशहर, गली, उस घर गयाआज मैं खुद से मिला मैं रहता हूँ
मुद्दतों से रहता आया हूँ यही घर है मेरा गन्दी नाली का कीड़ा मुझसे न उलझना मुद्दतों से रहता आया
चाहत में अगर दम है बन्देकायनात तेरे साथ होहर महफ़िल का तू हीरोहर जुबां पे तेरी बात हो दूध बस
यह चाहिए मुझे वह भी चाहिएयह मुझे दे दो वह मुझे ही दोइस पर हक मेरा बस मेरा हैक्यों और
यारो, गेम का मैंने कल गेम बजा दियामिशन इम्पॉसिबल अकम्पलीश कियावो दुनिया अलग थी, वो दुनिया ग़जब थीइंसां कम वो