वो घर जो छोड़ दिया (Wo Ghar Jo Chhod Gaya)
वो घर जो छोड़ दिया उसपे अब इख्तियार नहींमगर कहें किस तरह तुमसे हमें प्यार नहींवो घर जो छोड़ दिया […]
वो घर जो छोड़ दिया उसपे अब इख्तियार नहींमगर कहें किस तरह तुमसे हमें प्यार नहींवो घर जो छोड़ दिया […]
ऊंची छत पर शान से गर्दन अकड़ा कर घूमने वाले पंखेबांस की सीढ़ी पर चढ़ मैं तेरे सामने हूँ बता
पापा ने थी ज़िद पकड़ी जायेंगे वो अस्पतालजाकर पूछेंगे खुद बीमार पोते का हाल चाल बेटा बोला पापा मैं भी
दावा वो करते हैं कि सब समझते हैंपापा अब तक मुझको बच्चा समझते हैंमेरी सलाह अनुभव की ठोकर पर रखते
चोट लगी ऊँगली दिखाता था मुझकोबातें दिल की सब बताता था मुझकोदर्द ज़िन्दगी के अब छुपाने लगा हैबेटा अब दूर
ज़िन्दगी वैसे हर कदम सिखाती हैयाद स्कूल की अब भी लुभाती हैबचपन के दिन मोड़ ले आती हैयाद स्कूल की
पैंट पहना तो आंसू भर आयेमुद्दतें हो गयीं है ठुकराएजिया न लगे क्या करें हायलॉकडाउन से हम उकताए निक्कर टी-
बदलाव सिर्फ एक जुआ है अनिश्चितता का अँधा कुआँ हैनए को पकड़ो पुराना छूटे पुराना पकड़ो नया जा फिसले नए
मैं तो मासूम थी, नामालूम थी,बेचारी भूखी—मैं एक माँ थी।छल-कपट से मैं थी अनजान,बड़े पेट की भूख से परेशान।झूठे सत्कार
तुम एक सुबह छोड़ गयीमैंने सहा कुछ न कहावो कहते हैं घर अबपुराना हुआ छोड़ दोक्या कहती हो?छोड़ दूँ ?
पानी पानी कैसा पानी खारा पानी मीठा पानीगहरा पानी उथला पानी ठहरा पानी बहता पानी सावन के महीने मैं कैसे
घर बैठुंगा कल से शायर हो जाऊँगायारो मैं कल से रिटायर हो जाऊंगा ऑफिस ने रुतबा आत्मसम्मान दियारूपया प्रतिष्ठा और
रुख-ए-हवाओं की कहाँ परवाह किया करते हैंबाज़ परिंदे हौसलों से उड़ान लिया करते हैं नेकी बदी के फलसफे पर वक़्त
जग से तुमने ही मिलवायाकौन है क्या सब मुझे बतायापरमेश्वर का रूप तुझे माँदेख समझ में आया मेरी यह सामर्थ्य
कहाँ गए वो दिन जब यार फ़ोन लगाते थेवीकेंड पर साथ चाय का निमंत्रण दे जाते थे प्लानिंग में ही
ईंट गारे पत्थरों से तो मकां बना करते है, घर नहीं खिलता बचपन, जवानी की महकऔर छाँव बुढ़ापे की अगर
सदक़े ऐ अनजानी रूह इंसां को डरा दियामंगल विजयी को तूने घर में पनाह दिया भागा फिरता था मतवाला अनजाने
सुख के दिनों में जो दर्पण दिखाएरखे ज़मीन पर वह दिल की आवाज़ हैदुःख के समय में जो उम्मीद जगायेटूटने
कुछ छिन रहा, है या कुछ बनने वाला हैकुछ घट रहा है या नया कुछ घटने वाला है हो चला है
दिल ने चाहे थे फुर्सत के रात दिनलम्बी मगर यह फुर्सत जानलेवा है दरवाजे पर जो देता है दस्तक बार