इंतज़ार (Intezaar)

एक और दिन उसने
कुछ यूँ गुज़ार दिया
सूरज पूरब से पकड़ा
पश्चिम में उतार दिया

इन्तहा हो गयी थी
उसके इंतज़ार की
महबूब भी छोड़ गया
मौत ने नकार दिया

बैठे बैठे खुद से ही
उसकी बातें होती थीं
आँखों आँखों में उसकी
रात गुज़र होती थी
हर कोई बचता उससे
जैसे हो उधार लिया

एक और दिन उसने
कुछ यूँ गुज़ार दिया
सूरज पूरब से पकड़ा
पश्चिम में उतार दिया

मशरूफों की बस्ती में
हर शख्स तन्हा है
चलती का नाम है दुनिया
किसी ने ठीक कहा है

रुक कर जो बैठ गया
उसे जीते जी मार दिया

एक और दिन उसने
कुछ यूँ गुज़ार दिया
सूरज पूरब से पकड़ा
पश्चिम में उतार दिया

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