चाल कछुए की चला हूँ जी हाँ, मालूम है मुझे
रफ्ता रफ्ता ही सही मंज़िल पर पहुँच जाऊँगा ज़रूर

कब कहा मैंने कि दर्द जहां के पी सकता हूँ मैं
अपने बोलों से मगर कुछ ज़ख्म सहलाऊंगा ज़रूर

नहीं कहता कि बनवा दूंगा मैं एक ताज महल
ताज इस दिल को बना तुम्हें इसमें सजाऊंगा ज़रूर

हवा पानी के ज़हर से तुम्हारी हस्ती सलामत रहे
तसव्वुर के लिए कुछ सवालात छोड़ जाऊंगा ज़रूर

ज़लज़ले समन्दरों पर हाँ मैं नहीं ला सकता
मार कर पथ्थर मगर चंद लहरें उठाऊंगा ज़रूर

दम लिया है अभी ज़रा थका नहीं हूँ ना ही रुकूंगा
हौसले बुलंद हैं मेरे मैं चाँद छूकर आऊंगा ज़रूर

ज़मीन से जुड़ा हूँ मुझे गिरने का कोई डर नहीं है
छलांग तरक्की की ऊंची एक रोज़ लगाऊंगा ज़रूर

मैं चल दूंगा अकेला ही मंज़िले ज़ानिब मगर
तुम साथ दोगे जो मेरा तो साथ निभाऊंगा ज़रूर

सुना है कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
इरादों को मैं कोशिशों के हार पहनाऊंगा ज़रूर

बेशक निशाना-ए-तीर और तराश लो ज़माने वालो
मेरा दावा है कि मैं क्या हूँ एक दिन दिखलाऊंगा ज़रूर

One Comment

  1. बहुत सुंदर कविता ,,,, लोगों में प्रेरणा का संचार करने के लिए उपयुक्त👌👌

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