उधार की ज़िन्दगी (Udhaar Ki Zindagi)

आज फिर किराने वाले ने उधार नहीं दिया,
मज़बूर वो मज़लूम यूं गलत राह चल दिया।

उम्मीद की रौशनी कुछ कम सी हो गई,
ख्वाहिशों का ज़नाज़ा उठाये वो चल दिया

जिंदगी के रंग आज फिर फीके हो गए।
लहू का रंग ज़िन्दगी में भरने वो चल दिया

सपने जो देखे थे उन सबको चुराना पड़ा,
टूटे हुए कांच पर पाँव रख वो चल दिया

अंजान सफर, ज़िन्दगी जंग बनकर रह गयी
अंजाम लाज़मी था जिस्म में छलनी बन गयी

दर्द के बाद चीख फिर एक नयी उम्मीद
कोई आवाज़ गूँजती रही कानों में उसके

पर हर अँधेरी रात के बाद सवेरा आता है,
हर दर्द के बाद खुशियों का सेहरा आता है।

दिल को संभाल, मुश्किलें आती जाती हैं,
आज नहीं तो कल, राहें अपनी बनती हैं।

उधार की है ज़िन्दगी तू हौसला मत खोना,
ये सफ़र आखिरी है अब आराम से तू सोना।

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