अक्लमंद है शक्ल से मासूम नज़र आता है
यूँ वो शख्स हर बार ज़माने से छला जाता हैपहली मुलाकात में पलकों पे बिठाते हैं लोग
रफ्ता रफ्ता मगर एहसास गुम हो जाता हैदिल-ए-ऐतबार का जो खून बहाया है दोस्त
नहीं सोचा कि मुश्किलों से कमाया जाता हैमेरी अवाज़ की तल्खी पे शिकायत है तुम्हेँ
भरोसा खुद से भी अब तो उठा जाता हैमेरी बर्बादी पे सजे महल मुबारक हो तुम्हें
बड़े लोगों में शुमार नाम हुआ जाता है