तीन   लोक   करें   शोक  चराचर  सृष्टि  समस्त लजाती है
रोक  लो चलकर  राम लखन संग जानकी वन को जाती है
हृदय में संताप करे प्रलाप राम  की सिया पिया मन वासी है
जा  नहीं  सकते  बेबस  हैं  श्रीराम राह में  मर्यादा  आती है

सिया के देखो भाग लिखा है त्याग पिया संग वन वन भटकी
पवित्र  होकर  भी  अग्नि  में जली आज फिर वन को चल दी
लिए  राम  का  अंश  तज  रही  वंश विरह दुःख में भटकेगी
मर्यादा  की  कितनी और  प्रभु  राम  वह  अग्नि  परीक्षा देगी
मर्यादा  पुरुषोत्तम  के  किस  न्याय  की  यह  ऐसी  पाती  है
रोक  लो  चलकर  राम  लखन संग जानकी वन को जाती है

हृदय में संताप करे प्रलाप राम  की सिया पिया मन वासी है
जा  नहीं  सकते  बेबस  हैं  श्रीराम  राह में  मर्यादा  आती है

सांस   सांस   में   सिया   राम   के   रोम  रोम  में समायी है
अश्रु   नहीं   थम   रहे   नैनों   के  घडी  विकट दुखदायी है
मन   व्याकुल   है   अधीर   कर्त्तव्य   ने   बेड़ी  पैर थमाई है
ईश्वर   के  अवतार   को   मानव   व्यथा   समझ में आयी है
समर्थ   हुए   असमर्थ   नियति   यह   कैसा  नाच नाचती है
जा  नहीं  सकते  बेबस  हैं  श्रीराम  राह में  मर्यादा  आती है

तीन   लोक   करें   शोक   चराचर   सृष्टि समस्त लजाती है
रोक  लो   चलकर राम लखन संग जानकी वन को जाती है
हृदय में संताप करे प्रलाप राम  की सिया पिया मन वासी है
जा  नहीं  सकते  बेबस  हैं  श्रीराम राह में  मर्यादा  आती है

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