आरजू थी हमें सर उठाए के जीने की
रोटी कपड़ा मकां से कुछ ज़्यादा की ज़िद थी
कोशिश करते रहे कामयाब होते रहे
मकान से महल यूं ही बनते गए
न मालूम चला कब और कैसे मगर
हम सेहत से खिलवाड़ करते गए
मांगी तो थी हमने खुशियां दुआ में मगर
कभी ज़ेर ओ ज़बर से ना फुरसत मिली
एक दिन सांस अस्पतालों की बांदी हुई
महल ओ ज़र दुसरो के हवाले हुई
सांसों को अब मशीनों की दरकार है
क्या बताएं हम उन्हें कि क्या हाल है
आरजू किसकी थी क्या कमाते रहे
अपनी जिद पर खुद को ही लुटाते रहे