कम्बख्त इश्क़ (Kambakht IshQ)

बेटी को हमने अच्छा पढ़ा तो लिया है
होशियार हैं वैसे तो एमबीए कर लिया है
एक उलझन है मगर कैसे बताएं
कम्बख़्त ने दिल कहीं लगा लिया है

हमारे मज़हब में इज़ाज़त नहीं है
जात बिरादरी में होनी शर्मिंदगी है
बाप हुं मैं बहुत चाहता हुं उसको
मगर मनमानी कैसे करने दूँ उसको

एक रिश्ता नज़र में है अच्छा घर है
उनका ओहदा भी हमसे ऊपर है
कई बार समझाया है पगली को
गौर तो कर घरवालों की कही को

कहती है अब्बा जिंदगी का सवाल है
जब दिल ख़ुश नहीं तो जीना मुहाल है
क्या करूँ अब यही सोचा करता हूँ
बातें जो बनेंगी उनसे डरता हूं

इश्क भी कम्बखत क्या शै बना दी है
ख़ुदी और ख़ुदाई दोनों भुला दी है
दिल कुछ चाहता है कहीं और मन है
समझ से परे है यह जो उलझन है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *