कवि की प्रेयसी (Kavi ki Preyasi)

कवि की कविता और कल्पना
दोनों कवि की प्रेयसी हैं
जैसे कवि मासूम है
सखियाँ भी उसके जैसी हैं
कल्पना कवि की आँखें मूंद कर
रंगी सपने दिखलाती है
कविता फिर थपकी देकर
सच का बोध करा देती है
एक हुई नाराज तो
दूजी मुंह फुलाये बैठी है
जैसे कवि मासूम है
सखियाँ भी उसके जैसी हैं
कल्पना सुन्दर है कवि के
मन को आकर्शित करती है
सौन्दर्य नहीं किसी का कविता
यह एहसास करा देती है
एक प्रेमिका सी सूंदर
दूजी पत्नी के जैसी है
जैसे कवि मासूम है
सखियाँ भी उसके जैसी हैं
कवि की कविता और कल्पना
दोनों कवि की प्रेयसी हैं
जैसे कवि मासूम है
सखियाँ भी उसके जैसी हैं

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