‘कल्पना’अब बड़ी हो गयी है
बचपन से ही उसे
बड़े लाड प्यार से पाला है

वह अगर गिर जाती या  फिर
ज़रा सी भी चोट लग जाती
तो दिल बैठ ही जाता था

मगर अब सब ठीक है
वह बड़ी हो गयी है न !

अब वह बाहर जाने के लिए
मुझसे नहीं पूछती है खुद ही
स्वच्छंद इधर उधर, यहां वहां,
गलियां कूचे, गाँव शहर,
देश विदेश,आसमान पर्वत,
बादल झरने लांघती
कहीं भी चली जाती है

और मुझे भी चिंता नहीं रहती
अब वह बड़ी हो गयी है न !

आखिर मेरी ‘कल्पना’
मेरी बेटी जैसी ही तो है,
और मेरे मन का शहर भी
दिल्ली जैसा  नहीं है, है न ?

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