कौन ले गया लिखने का हुनर मेरा
तसव्वुर का गहरा समंदर मेरामें नहीं कोई बदनाम शायर
न खायी चोट उल्फत में दिल पर
दौर आया कि अल्फाज़ जुड़ते गए
परिंदे खुले आसमां में उड़ते गएकुछ अपनी कही कुछ जहान की
टोह मिलने लगी ऊंचे आसमान की
जा पहुंचा वहां जहाँ न पहुंचे थे रवि
न जाने कब मर गया अंदर कविहाथ में कलम मगर बोल मेरे पास नहीं
दिल की गहराई में घुमड़ते ज़ज़्बात नहीं
जाने कब छोड़ गई मुझे प्रतिभा मेरी
बेजान जिस्म है खो गयी कविता मेरीज़माना मशरूफ है कहाँ फुर्सत है
इस दौर में जज्बात की न कीमत है
कद्र नहीं तो लिखने से क्या हासिल
भूल जाऊं फन बस यही है मुनासिबले लो कलम, लिखने का हुनर मेरा
तसव्वुर का गहरा समंदर मेरा