ऐ गांधी तेरी टोपी कहाँ गई
खुद पहनते हो न गैर कोई
आज दिल में ख़याल आया
खाली मन में शैतान आया
अपने व्यक्तित्व की शान खो बैठे हो
जब से नोटों पर विराजमान बैठे हो
असल में अपनी पहचान खो बैठे हो
टोपी तुम्हारे नाम से जानी जाती थी
‘गाँधी टोपी’ से वो पहचानी जाती थी
भारत को एक सूत्र में ले आती थी
सर्वप्रथम तुमने जो तिरस्कार किया
नोट मिले टोपी को ही बिसार दिया
चश्मा दिखता है छड़ी है, घड़ी भी
मगर टोपी नहीं! क्यों यह होने दिया
टोपी सम्मान राष्ट्रपिता की थी, खो गई
घर के पिता की भी इज़्ज़त साथ ले गई