पुरानी तस्वीर की डीपी लगाए बैठा हूँ,
बुढ़ापे से इस तरह मुँह छुपाए बैठा हूँ।
जवानी छोड़ गई है दामन कब का,
जवाँ हूँ अभी—दिल को समझाए बैठा हूँ।
बालों पर लगा ली है कालिख अजब,
झुर्रियों को भी खिंचवाए बैठा हूँ।
घुटने दुखते, दाँत में दर्द ज़रा—
खोटे सिक्कों को आज़माए बैठा हूँ।
सीढ़ियाँ उतरता हूँ रोज़ भाग कर,
नौजवानों सी हिम्मत जगाए बैठा हूँ।
हसीनों को देख छूट जाता है पसीना,
खामखाँ अपना बीपी बढ़ाए बैठा हूँ।
सिहर उठता हूँ सुनकर बुरी कोई ख़बर,
बंद कमरे में खुद को छुपाए बैठा हूँ।
कल गया—और कल की ख़बर भी नहीं,
वक्त के हाथों खुद को लुटाए बैठा हूँ।
चल देना है एक रोज़ सफ़र पर गोया,
प्लेटफ़ॉर्म पर हूँ—टिकट कटाए बैठा हूँ।