दिल्ली तुम.. (Dilli Tum)

सच कहूं तो इश्क़ मुझे तुमसे नहीं है
और भरोसा तो जान हरगिज़ नहीं
पैवस्त हो दिल में ख़ुलूस की तरह
नशे की जैसे लत हो जो छूटती नहीं
कभी जाऊं दूर सदा देने लगती हो
दिल्ली तुम पहलु में बुलाने लगती हो

किरदार तुम्हारा मुझे पसंद नहीं है
अल्हडपन ये बेबाकी पसंद नहीं है
जो मिलता है सीने से लगा लेती हो
हर एक को दामन में जगह देती हो
शिकायत पर मेरी इतराने लगती हो
दिल्ली तुम पहलु में बुलाने लगती हो

मुझे इल्म है की तू गैर है अपनी नहीं
पगली आवारा तू सगी किसी की नहीं
साँसों में तेरी ज़हर है तू दूर ही भली
शौकिया बिकती है हर रोज़ गली गली
रूठ जाऊं तो हसकर मानाने लगती हो
दिल्ली तुम पहलु में बुलाने लगती हो

कभी सराहूं मैं तुझे ऐसा मुमकिन नहीं
छोड़ जाऊं राह में मुनासिब ये भी नहीं
दिल का कम्बख्त कोई ठिकाना नहीं है
तेरे सिवाय कहीं और लगता ही नहीं है
टूटा हूँ कई बार तुम बनाने लगती हो
दिल्ली तुम पहलु में बुलाने लगती हो

मेरे जूनून की है तू वजह मेरी आदत है
मेरी नफरतों को पी लेना तेरी इबादत है
इस रिश्ते को बता भला क्या नाम दूँ मैं
जान लूँ तेरी या फिर अपनी जान दूँ मैं
ज़ख्म देकर दिल पर सहलाने लगती हो
दिल्ली तुम पहलु में बुलाने लगती हो

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