एकलव्य होकर भी वह हो गया भव्य
अश्वत्थामा होकर भी तुम भटक रहे
मृत पराक्रमी वीर धनुर्धर एकलव्य
तुम मृत्यु आलिंगन को हो तरस रहे
कृष्ण के हाथों मृत्यु पा वह हुआ मुक्त
मृत्यु उपेक्षित तुम हो वन वन भटक रहेगुरुशीर्ष के तुम सुपुत्र
वह निरा अस्वीकृत द्रोणशिष्य
असंख्य व्यवधान सहे
बल दे दिया अंगुष्ठ कि
सम्मान गुरु का प्रकट रहेगुरु-शिष्य परंपरा का वह हुआ गौरव
पितृ मृत्यु का कारण बन तुम भटक रहेएकलव्य होकर भी वह हो गया भव्य
अश्वत्थामा होकर भी तुम भटक रहे
मृत पराक्रमी वीर धनुर्धर एकलव्य
तुम मृत्यु आलिंगन को हो तरस रहे
कृष्ण के हाथों मृत्यु पा वह हुआ मुक्त
मृत्यु उपेक्षित तुम हो वन वन भटक रहेउससा न धनुर्धारी कोई
तुमसा न अत्याचारी कोई
भावना में तुम यों बहे
कोख उत्तरा की बेधी
अजन्मे प्राण थे जिसमें सिमट रहेएकलव्य होकर भी वह हो गया भव्य
अश्वत्थामा होकर भी तुम भटक रहे
मृत पराक्रमी वीर धनुर्धर एकलव्य
तुम मृत्यु आलिंगन को हो तरस रहे
कृष्ण के हाथों मृत्यु पा वह हुआ मुक्त
मृत्यु उपेक्षित तुम हो वन वन भटक रहेएकलव्य होकर भी वह हो गया भव्य
अश्वत्थामा होकर भी तुम भटक रहे