पिताजी (Pitaaji)

उम्र भर संघर्षों में जूझते रहे
परिवार को पसीने से सींचते रहे
ख़ुशी बांटी दुःख का ज़िक्र नहीं किया
पिताजी ने तंग बिलकुल नहीं किया

साया बनकर वे छाया देते रहे
अपने हितों से किनारा करते रहे
परेशान थे कभी ज़िक्र नहीं किया
पिताजी ने तंग बिलकुल नहीं किया

पिताजी अब बूढ़े थे बीमार थे
बीमारियों के कारण लाचार थे
चुपचाप सब सहा ज़िक्र नहीं किया
पिताजी ने तंग बिलकुल नहीं किया

एक दिन तबीयत बिगड़ ही गयी
अस्पताल में साँसें उखड़ती गयीं
देखा किया मगर ज़िक्र नहीं किया
पिताजी ने तंग बिलकुल नहीं किया

अस्पताल में कोई मिलने नहीं आया
तकते रहे शून्य में दिल भर आया
इंतज़ार था मगर ज़िक्र नहीं किया
पिताजी ने तंग बिलकुल नहीं किया

अस्पताल ने खबर घर भिजवाई
ले जाओ इन्हे घर सेवा करो भाई
आँख मूँद चल बसे ज़िक्र नहीं किया
पिताजी ने तंग बिलकुल नहीं किया

बहुत कुछ वे कहना चाहते थे
अपनों के बीच मरना चाहते थे
किस से कहते सबने मुँह फेर लिया
पिताजी ने तंग बिलकुल नहीं किया

आज घर में रसम पगड़ी की थी
लगी आंसूओं की झड़ी अपनों की थी
कितने महान थे सबने ज़िक्र किया
पिताजी ने तंग बिलकुल नहीं किया

सच जीवन के बहुत गहरे है
रिश्तों पर खुदगर्जी के पहरे हैं
जीते जी किसी को रुसवा नहीं किया
पिताजी ने तंग बिलकुल नहीं किया

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