चाट पकोड़ी का मन था
जुड़ा उससे क्योंकि बचपन था
ठेले वाला जब आया
वो बैठी मेरे पास थी
रिमझिम की बरसात थीमैंने पूछा खाओगी क्या
उसने बोला मन नहीं
पर तुम खाओ तो
एक ले लुंगी और क्याठेले वाले से बोला मैं
ला पानी पूरी खिला
तीखा रखियो कम
पानी थोड़ा दे हिला
और शुरू हो जाफ़िर एक मैंने और एक उसने
गपकने की शुरूआत की
आपस में ना बात की
मैं पांच पर थक गया
पर मैडम बदहवास थीतीस गोलगप्पे खाकर बोली
बस भैया पेट भर गया
तीखा ज़्यादा डालकर
चार चल और खिलामेरा भेजा फ्राई हुआ
मन नहीं था तो चोंतीस खाये
मन होता तो क्या होता
तभी कान में आवाज आई
भैया आलू वाला और खिलाना
मसाला तेज़ हो पैसे मत लगानात्रिया चरित्र पुरुषस्य भाग्यम्
देवो न जानाति कुतः मनुष्यम्