मोहे प्रीत सिखलाय गया (Mohe Preet Sikhlaay gaya)

पनघट पर घेरि के श्याम सुन्दर मोहे मुरली मधुर सुनाय गया
कजरारे नयन चंचल चितवन मोहे अपने ही रंग रँगाय गया
सखी सोई सपनों में खोई मैं अखियन सों नींद उड़ाय गया
तितली सम उड़त रहूं बन बन तन मन उमंग जगाय गया

ऋतु सावन मधुर सुहानी लगे बन बदरा जल बरसाय गया
चितवन की आभ लई मोरी मुख से चुनरी सरकाय गया
चन्दन संग लिपटे भुजंग ज्यों उर मोहे कान्हा लगाय गया
निस दिन छलिया का नाम जपूँ अंतर्मन मोरे समाय गया

कान्हा संग प्रीत लगी  मोरी जिनके संग हार सिंगार गया
प्रेम के बस ढाई आखर सुध बुध तन मन की बिसराय गया
अंतर्मन में उजियारा बसे मन मंदिर दीप जलाय गया
तारक संग जोरि है प्रीति सखी जनम मरण सब तार गया

मन रोवत श्याम सों जाय मिलूं परदेस मोहे बिसराय गया
रह रह पथ मैं निहार रही आहट सुन जिय अकुलाय गया
मन व्याकुल नैना भीज रहे जाने कौन से देस को धाय गया
बाजेगी मुरली मिलन की जब फिर सोच ह्रदय इतराय गया

तजि गोपिन ग्वाल वृन्दाबन धाम संकट बंशीधर डार गया
विरह की अग्नि में सुलगत मन तन खोजत हरि को हार गया
अब आन मिलो वृषभान लला मिलान का सकल उपाय गया
मोहे प्रेम पाश में बाँध कहो मत रो राधे प्रभु आय गया

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