बिन कारण (Bin Kaaran)

गर्मी बढ़ी धरती तपी बैचेनी मची तो बारिश हुई
प्रकृति की शोभा बढ़ी नवजीवन की आस हुई
नवजीवन का वर्षा और गर्मी वर्षा का कारण थी
गर्मी और बर्षा इन दोनों का कारण बेचैनी थी

शोभा और नवजीवन का श्रेय मिला नभवर्षा को
गर्मी बैचेनी का योगदान याद रहा भला किसको

दिन रात जले है बाती रौशनी के श्रेय दीपक को
सरस्वती भूतल सींचे जल का श्रेय नदी जल को

सियाराम थे संग बन में लक्ष्मण ने त्यागा पत्नी को
चौदह बरस का विरह सौंप छोड़ गए निजस्त्री को

मन मेरे न मन मैला कर जो न नाम मिला प्रयासों को
माली ने मन से बीज बोये वृक्ष फल देते हैं औरों को

आभूषण श्रम नर का बिन कारण मदद के हाथ बढ़ा
फिर कारण क्यों खोजे जब ईश्वर तेरे साथ खड़ा

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