मासूम मुलाकात (Masoom Mlakaat)

वो जिनके ख्वाब हम
अक्सर सजाय़ा करते थे
तसव्वुर में जिनके
दिन गुजारा करते थे

उनसे मिलने की बेकरारी
मिलकर छूने की बेताबी
काम कोई भी हो किबला
जाना उस गली से हर बारी

जिनके सूरत को चांद
हम कह दिया करते थे
दिल में जिनको खुदा मान
सजदे किया करते थे

पलकें जिनकी राह में
बिछ जाया करती थी
वो आती तो कायनात
दुल्हन बन जाया करती थी

वो जो गुम हुए माज़ी में
मिल कर भी जो ना मिले
टीसरी गाली में नाती
पोते खिलाते हुए मिले

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