सरकारी था ऑफिस उस ऑफिस में मैडम
बॉस की थी चहेती उनके सुपरवाइज़र हम
प्रेम की इस कहानी का एक हिस्सा थे हम
हमें भी अच्छी लगती थी झूठ क्यों बोलें हमखुशबु भर जाती थी मैडम जब भी आती थी
तबीयत खिल जाती थी जब पास आती थी
टिफ़िन जब खाती थी तो साथ खाते थे हम
हमें भी अच्छी लगती थी झूठ क्यों बोलें हमकाम ऑफिस का मैडम से कैसे करवाते हम
करतीं ढेरों गलती बॉस से गाली खाते थे हम
अपना काम और उनका भी निपटा लेते थे हम
हमें भी अच्छी लगती थी झूठ क्यों बोलें हममैडम अक्सर स्माईल के हमको जाम पिलाती
अपने काम वो धीरे से यों हमारे काँधे टिकाती
उनके बाणों से घायल हो जब हम खो जाते थे
धीरे से कानों में हमारे मैडम गुनगुनाती थी“शर्मा जी अब भला आपसे क्या छुपाना है
बात ये है मुझको आज हाफ-डे जाना है
बॉस से पूछा तो कहता है मंडे मीटिंग है
प्रैज़ेन्टेशन देनी है काम आज निपटाना है
खुद करो या करवाओ आई डोंट केयर
फिनिश एंड देन गो, एप्रोच सुपरवाइज़र”आप जैसा काबिल मेरी नज़र मेँ कोई नहीं है
मेरी किसी और से वैसे भी बनती नहीं है
घर सत्यनारायण की पूजा मेरा कोई न दूजा”अपनी प्रशंसा सुन मैडम से खो जाते थे हम
हमें भी अच्छी लगती थी झूठ क्यों बोलें हममौका देखकर फिर मैडम अपना पर्स उठाती
“सी यू टुमोरौ” कह नज़र से ओझल हो जाती
अगले दो दिन की सीएल की ईमेल आ जातीकाम करते हम ऑफिस मेँ फल खाती मैडम
हमें भी अच्छी लगती थी झूठ क्यों बोलें हमकाम ऑफिस का मैडम से कैसे करवाते हम
करतीं ढेरों गलती बॉस से गाली खाते थे हम
अपना काम और उनका भी निपटा लेते थे हम
हमें भी अच्छी लगती थी झूठ क्यों बोलें हम