सदक़े ऐ अनजानी रूह इंसां को डरा दिया
मंगल विजयी को तूने घर में पनाह दिया
भागा फिरता था मतवाला अनजाने पथ पर
वर्तमान को रोंदा भविष्य के हाथों बिक कर
तीन वक़्त की रोटी दो कपड़ों में चुका दिया
छोटे बड़े का फर्क था भाई भाई का दुश्मन
दुनिया बनी जंग का मैदां हर सू बस अनबन
इंसां को मिलजुल कर तूने जीना सिखा दिया
सेवा भाव से संकट में एक दूजे को थाम लिया
देर सही, मानव ने जीवन सत्य को जान लिया
पढ़ लिख कर न समझ तूने सिखा दिया