वाह क्या अंदाज़ है (Wah Kya Andaaz Hai)

चाय पीना पिलाना न सिर्फ एक रिवाज है
यह शै जिससे रिश्तों में सोज़-ओ-साज़ है
चाय की महक से तबीयत खिल जाती है
चाय से महफिलों की रंगत बन जाती है
चाय से मान जाया करते हैं जो नाराज़ हैं

चाय पीना पिलाना न सिर्फ एक रिवाज है
यह शै जिससे रिश्तों में सोज़-ओ-साज़ है

आसां है यह कहना कि मैं चाय नहीं पीता
या छोड़ दी है मेरे दोस्त मैं अब नहीं पीता
तू चाय नहीं पीता और पिलाता भी नहीं है
तू अब मुझे अपने घर बुलाता भी नहीं है
किसने बहकाया है तुझे इसमें क्या राज है

चाय पीना पिलाना न सिर्फ एक रिवाज है
यह शै जिससे रिश्तों में सोज़-ओ-साज़ है

मिलने मिलाने का सिलसिला चाय से था
तुझसे मेरा रिश्ता यार जो दोस्ती का था
अब किस बहाने से मैं तेरे करीब आऊं
बैठूं पास तेरी सुनूं और दिल की बताऊँ
कैसे तुझसे पूछूं मैं बता कैसे मिजाज हैं

चाय पीना पिलाना न सिर्फ एक रिवाज है
यह शै जिससे रिश्तों में सोज़-ओ-साज़ है

चाय थी तो हम दोनों में एक खिंचाव था
करीब एक दूसरे के होने का एहसास था
कितनी आसानी से कह दिया छोड़ दी है
चाय नहीं तूने तो अपनी यारी तोड़ दी है
चाय बहाना है असल में तू दगाबाज़ है

चाय पीना पिलाना न सिर्फ एक रिवाज है
यह शै जिससे रिश्तों में सोज़-ओ-साज़ है

मैं आया भी था मिलने एक दिन तेरे पास
कि बैठूंगा कुछ देर जिगरी यार के पास
तू बोला था यार हम तो चाय पीते नहीं हैं
तू पिये तो मंगाऊं यार चाय पत्ती नही है
अपनी दोस्ती चाय पत्ती की मोहताज है

चाय पीना पिलाना न सिर्फ एक रिवाज है
यह शै जिससे रिश्तों में सोज़-ओ-साज़ है

यारी में जारी की तूने एक नई रिवाज़ है
पीऊंगा न पिलाऊंगा, वाह क्या अंदाज है

चाय पीना पिलाना न सिर्फ एक रिवाज है
यह शै जिससे रिश्तों में सोज़-ओ-साज़ है

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