वो नाज़नीं (Woh Naazneen)

वैसे तो अपनी ये पहली मुलाकात थी
उस नाज़नीं में कुछ अलग बात थी
मेरी पड़ी उस पर नज़र वो बेखबर
थी गुम अपने खयालात के साथ थी
उस नाज़नीं में कुछ अलग बात थी

झील सी गहरी आखें कुछ ढूँढती थी
मन में गुनगुना रही वो कोई धुन थी
नाक में बड़ी सी बाली एक सजी थी
होठों को जो बार बार चूम लेती थी
उँगलियाँ ज़ुल्फ़ों से खेलती जाती थी
जवानी के पहले पड़ाव की पाती थी

मेरी पड़ी उस पर नज़र वो बेखबर
थी गुम अपने खयालात के साथ थी
उस नाज़नीं में कुछ अलग बात थी

जुबां खामोश थी अदा बोल रही थी
दिल के राज़ जैसे सब खोल रही थीं
पैरहन सादा और गालों के डिम्पल
मेरी नज़रें टिल कातिल ढूँढ रही थी
कभी देख लेती थी वो यूँ ही बारहा
कभी दांतों तले नाखून पीस रही थी

मेरी पड़ी उस पर नज़र वो बेखबर
थी गुम अपने खयालात के साथ थी
उस नाज़नीं में कुछ अलग बात थी

उसे जाना था अलग मैंने कहीं और
ख्यालों में ख़याली पुलाव पका गयी
मैं देखता रहा उसने न देखा मगर
मम्मी की नज़र मुझ पर पड़ गयी
जलती निगाहों से आंटी ने घुरा मुझे
एसी की ठंडक में जैसे लू लग गयी
फिर घड़ी आई जिसमें थी जुदाई
मेरे तसव्वुर को पैरों तले रोंद कर
वो नाज़नीं आँखों से ओझल हो गई

मुझमें शामिल है हसीना वो बेखबर
थी गुम अपने खयालात के साथ थी
उस नाज़नीं में कुछ अलग बात थी

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