वो सभ्यताएँ..

सभ्यताएँ वो तबाह हुईं
जब सब मिलजुल बैठा करते थे,
सुख-दुख में रहते साथ
घर एक-दूजे के जाया करते थे।

शादी-ब्याह, जन्मदिन हो
या कोई भी ख़ुशी का मौका,
हँसते-गाते, कहकहे लगाते
वो काम निकाला करते थे।

मौसी-मामा की शादी हो
दिन भर मस्ती खूब छनती थी,
बच्चों की टोली अलग
बड़ों की टीम अलग जमती थी।

आलू-मटर छीलतीं सब
स्त्रियाँ पूरियाँ तलती जातीं थीं,
हलवाई का काम बँटातीं
हँसी-ठिठोली रंग जमाती थीं।

रिश्तों में रस, वो लिहाज़
आँखों में सजाया करते थे।

सभ्यताएँ वो तबाह हुईं
जब सब मिलजुल बैठा करते थे…

सुविधाएँ थीं कम मगर
दुविधा की जगह न होती थी,
सहजता के उस दौर में
साझी ज़िम्मेदारियाँ होती थीं।

होली का हुड़दंग, दिवाली की उमंग
दिल में मैल न रखते थे,
लड़ते थे, झगड़ते थे
फिर से एक हो जाया करते थे।

सभ्यताएँ वो तबाह हुईं
जब सब मिलजुल बैठा करते थे
सुख-दुख में रहते साथ
घर एक-दूजे के जाया करते थे।

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