संकोच का पहाड़ (Sankoch Ka Pahaad)

प्यार था विश्वास था
दोनो के रिश्ते में
बहुत कुछ खास था
प्यार का मैं उनसे कभी
इजहार न कर सका
मैं अपने पिता के कभी
गले नहीं लग सका

जाने कौन रोकता था
न जाने किसका डर था
“पापा आप से मैं
बहुत प्यार करता हूं”
कहना तो था उन्हें पर
दूरी तय न कर सका
मैं अपने पिता के कभी
गले नहीं लग सका

मां से दिल की बात
अलबत्ता कह लेता था
दिल की बात कहकर मैं
हलका दिल कर लेता था
पहाड़ संकोच का कभी
न पार न कर सका
मैं अपने पिता के कभी
गले नहीं लग सका

इसलिये मेरे बच्चे मैँ
तुमसे कहना चाहता हूँ
तुम्हें करीब बिठाकर
दिल खोलना चाहता हूँ
गले लगाना चाहता हूँ
तुम्हारी भी झिझक कहीं
पहाड़ सी न बन जाये
और दूरी बढ़ती  जाये
बेटे मैं तुमसे यह बात
कह देना चाहता हूँ
बहुत प्यार करता हूँ
गले लगाना चाहता हूँ

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