सुबह का अखबार (Subah Ka Akhbaar)

सुबह हमेशा की तरह
मनमोहक और हवा ताज़ी थी
मगर वह कमज़ोर दर्द से
बेइंतेहा परेशान और सदमे में थी
जिस्म के एक एक हिस्से में
जैसे आग लग रही थी
सुबह के उजाले से  कहीं गहरा
उसकी आखों में अँधेरा था

जानवर बुद्धि थी इसलिए
उसे समझ नहीं आ रहा था
वह कुछ भी ठीक से
याद नहीं कर पा रही थी
याद है तो बस इतना कि
अपने छोटे से बछड़े की
ममता में डूबी सड़क पर
वह चली जा रही थी बेखबर

आस पास इक्का दुक्का गाड़ियों की
आवाज़ें उसके कानों में पड़ती थीं
मगर उसका ध्यान बछड़े में ही था
पता नहीं कैसी हालत में होगा
उसकी तलाश में वह बेतहाशा
तेज़ क़दमों से जा ही रही थी
कि अचानक कोई भरी चीज़
उसके सर से टकराई और
वह उछल कर दूर जा गिरी

उसकेबाद उसे कुछ भी
याद नहीं पड़ा जब होश आया
तो उससे खड़ा नहीं हुआ गया
बदन के नीचे से पानी जैसी
कोई लाल चीज़ बह रही थी
अपने बछड़े को याद करते ही
आँखों से भी पानी बहने लगा

सुबह का उजाला और
उसकी आँखों में अँधेरा
बढ़ते ही जा रहे थे
सड़क का शोरगुल कानों में
अब काम होने लगा था
उसका भरा पूरा बदन
ढीला पड़ने लगा था और
अब तो बोझ लगने लगा था

आसपास भीड़ जमा हो गयी थी
अब शायद वक्त था आँखें बंद करके
ज़िंदा रहने की सभी कोशिशों को
अलविदा कह देने का!

सुबह के अखबार में खबर छपी थी
तेज़ ट्रक गाय को टक्कर मार कर भागा

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