आइना हर रोज़ कुछ ज़्यादा डराता जाता है
चेहरे पे चिंता की लकीरें गहराता जाता है।
उम्रदराज़ शरीर कुछ और मुरझा जाता है,
हर सांस का बोझ मानो बढ़ता जाता हैजेहन के गमले में सूख चुके यादों के फूल हैं,
बीता वक़्त मगर दिल में घर कर जाता है
जवानी की प्याली से हमें यूं निकाल फेंका है,
जैसे कि चाय में से मक्खी को फेंका जाता हैआइना हर रोज़ कुछ ज़्यादा डराता जाता है
चेहरे पे चिंता की लकीरें गहराता जाता है।
उम्रदराज़ शरीर कुछ और मुरझा जाता है,
हर सांस का बोझ मानो बढ़ता जाता हैख़्वाब जो कभी आंखों में चमका करते थे
याद करके हम उन्हें तिलमिला जाते है
वो जोशीले दिन, अब दूर धुंए से दिखते हैं,
धुंए में अपना वज़ूद कहीं खोया जाता हैआइना हर रोज़ कुछ ज़्यादा डराता जाता है
चेहरे पे चिंता की लकीरें गहराता जाता है।
उम्रदराज़ शरीर कुछ और मुरझा जाता है,
हर सांस का बोझ मानो बढ़ता जाता हैसुबह फिर भी एक उम्मीद रोज़ जगाती है,
सफर बाकी है अभी ये एहसास दिलाती है
जो बीत गया, वो दोस्त कभी लौटेगा नहीं,
पर हर आज के बाद कल ज़रूर आता है