स्याह रात (Syaah raat)

ग़म संभलता नहीं दम निकलता नहीं
स्याह ये रात क्यों काटे कटती नहीं है
तेरी खुश्बू से घरअब भी लबरेज है
ये महक इस दिल से क्यों हटती नहीं है

तुमसे होता था रोशन कभी अपना जहां
अंधेरे घने क्यों अब सिमटते नहीं हैं
वो लम्हे कभी जब तुम हम साथ थे
क्यों कंबख्त फिर से पलटते नहीं हैं

आंसू आँखों में धड़कन थम रही है
जां तुम्हारे बगैर निकलती नहीं है
आ जाओ कि सांस थमने लगी है
मौत आगोश में लेती क्यों नहीं है

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