आंसू बहे और न काँधे ही मिले
मुसाफिर सफर पर चल भी दिए
चीख-ओ-पुकार बस शोर हाहाकार
वक्त के उलटे पहिये में लाखों पिसे
वीरान बस्तियां बुजुर्ग मदहोश थे
सहमी सदमे में नस्लें आंसू पिए

बवंडर थमेगा तो मालूम होगा
पेड़ कितने और घर कितने उजड़े
मंज़र ज़माना यह भूलेगा नहीं
देना होगा हिसाब इंतज़ार कीजिये

सहमी सी ताकती रही ये ज़मीन
सदमे में था ऊपर अम्बर तमाम
इंसानियत शर्मसार होती रही
रात दिन सुलगते रहे शमशान

जगजा खुदा के बंदे अब तो जाग जा
आनेवाली नस्लों का क्यों दुश्मन बना
मदहोशी तू मन मानी करता जा रहा
आँख खोल देख काल है सामने खड़ा

बवंडर थमेगा तो मालूम होगा
पेड़ कितने और घर कितने उजड़े
मंज़र ज़माना यह भूलेगा नहीं
देना होगा हिसाब इंतज़ार कीजिये

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