किस्मत जो दगा दे इंसां बेबस हो जाता है
एरोप्लेन में यात्री को कुत्ता काट खाता है
किस्मत मेहरबां है गधा लगे पहलवां है
जग से लोहा लेता अपनों से हार जाता हैघर की मुर्गी दाल बराबर
धोती बने रूमाल बराबर
किस्मत रूठ जाये जीवन
हो ढोल बिन खाल बराबरडॉक्टर का पेशा देखो सबका इलाज रखता है
खुद की बीमारी में पर सब हुनर भूल जाता है
टीचर यूँ तो शिक्षा का दीप घर घर जलाते हैं
बालक उनके लेकिन ज़्यादा नहीं पढ़ पाते हैंघर की मुर्गी दाल बराबर
धोती बने रूमाल बराबर
किस्मत रूठ जाये जीवन
हो ढोल बिन खाल बराबरसमझदार थे राणा जी होशियार थे शर्मा जी
चुटकियों में झगड़े सब के सुलझा देते थे जी
किस्मत रूठी तो काम न आई थी होशियारी
अपनों ने तिल तिल लूटा धरी रही समझदारीघर की मुर्गी दाल बराबर
धोती बने रूमाल बराबर
किस्मत रूठ जाये जीवन
हो ढोल बिन खाल बराबर