कैसे कह दूँ की तुम मेरी ज़रुरत नहीं
तुम बिन ज़िन्दगी का सबब ही नहीं
अकेला हूँ मगर भीड़ भी चाहिए
फुर्सतों के लिए काफी जंगल नहीं
डूबना है समंदर के आगोश में
सूखी नदियों को हासिल ये कूवत नहीं
देखकर मुझको उड़ता परिंदा कहे
शाम होने लगी है ठहर जा यहीं
खाली थिएटर में तनहा बिठाकर मुझे
रंग रोज़ नए दिखाए खुदाया कोई