नवाज़िश (Navazish)

पशेमा न हो कि तू वक़्त पर नहीं पहुँच सका
ऊपरवाले ने तुझे वहां रखा जहाँ होना चाहिए
माना कि मिजाज़ मौसम के जरा हैं बिगड़े हुए
खुदा का है करम कि मुझे छतरी नहीं चाहिए

हर कदम पर लोग मिलते हैं कांटे बिछाते हुए
लाख मुश्किलें हों फिर भी राहें मिल जाती हैं
हर दुःख के साथ लिखे हैं उसने सुकून के पल
खुदा का है करम कि मुझे छतरी नहीं चाहिए

बादलों की ओट से झांकती जो धुप प्यारी लगे
इंद्रधनुष के रंग कैसे सब तरफ बिखर जाते हैं
आसमां भी झुक जाए तो मुझे कोई फ़िक्र नहीं
खुदा का है करम कि मुझे छतरी नहीं चाहिए

टूट जाते हैं अरमान चूड़ियों की तरह फिर भी
नयी उम्मीदें नए सवेरों में फिर जग जाती हैं
तारों ने किया हैं रौशन खुदाया आसमां देखो
खुदा का है करम कि मुझे छतरी नहीं चाहिए

थोड़ी धूप फिर थोड़ी बरसात का मज़ा लेते हैं
फिसलते कदमों को थाम लेना हमें आता है
रंगीं सपनों की तह में हक़ीक़त तलाशता हूँ
खुदा का है करम कि मुझे छतरी नहीं चाहिए

बादलों की ओट से झांकती जो धुप प्यारी लगे
इंद्रधनुष के रंग कैसे सब तरफ बिखर जाते हैं
आसमां भी झुक जाए तो मुझे कोई फ़िक्र नहीं
खुदा का है करम कि मुझे छतरी नहीं चाहिए

 

 

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