मृगतृष्णा(Mrigtrishna)

जीवन के अंजान सफर में
नया मोड़ आने वाला है
एक राह मुड़ने वाली है
एक राह जुड़ने वाली है
सफर कठिन होने वाला है
नया मोड़ आने वाला है

राही को परवाह नहीं है
वो पथ पर चलने वाला है
मंजिल दर मंजिल
वह तो बढ़ जाने वाला है

नई राह पर पता नहीं है
नए फूल खिलते होंगे
या कांटे पैर चुभेंगे
लोग पुराने छूट जाएंगे
हिम्मत के पंख टूट जाएंगे
हाल बुरा होने वाला है

राही को ये पता नहीं है
आगे एक सुनसान डगर है
सूखे उजडे खेतों में
सन्नाटा जैसे मरघट है
उबड़ खाबड़ रस्ते पर
कोई नहीं जो राह दिखाये
भुखे प्यासे राही को
कोई छांव दे प्यार जताये
सब्र बांध ढहने वाला है

राही को परवाह नहीं है
वो पथ पर चलने वाला है
मंजिल दर मंजिल
राही बढ़ जाने वाला है

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