इश्क की खाट (Ishq Ki Khaat)

एक टाइम कम्मो तू कितनी अच्छी लगती थी
ये नज़र तेरे चेहरे से हटती ही नहीं थी
आ जाती थी जो कभी रूबरू कम्मो
तू देखे न जो हमको तो मिर्ची लगती थी

शुरुआत में तो तूने कम ही रिस्पांस दिया
नखरा किया मगर फिर खूब चांस दिया
याद है तुझे हम दोनों साथ साथ फिरते थे
जलते थे सब मगर कहाँ परवाह करते थे

तेरे प्यार पे था अपने को बड़ा नाज़ कम्मो
माँ बापू भी दोनों हो गए नाराज़ कम्मो
फिर भी तेरा कभी हमने साथ नहीं छोड़ा
एक तेरे लिए हमने सब रिश्तों को छोड़ा

फिर एक रोज़ तूने हमको धोखा दे दिया
दिल हमको मगर वादा किसी और को दिया
आबाद तू हो गयी अपन साला बर्बाद हो गया
शराफत से भी अपन उस रोज़ आज़ाद हो गया

अब साला ये आशिक़ न जाने क्या करेगा
मारेगा किसी को या गरीब खुद ही मरेगा
अपना जिंदगी का साली तू वाट लगा डाली
चारों पैर खड़ी इश्क की खाट लगा डाली

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