याद नहीं जाती दिल से बचपन के नादान दिनों की
खुले आंगन में सो जाते हम हरे नीम के नीचे हीहुकु पंछी का कलरव और आंखें हो जाती बोझिल
पास अम्माजी पीटा करती गीले कपडे हिल हिल
पानी की छिटकतीं बूंदें टकरा जातीं जब चेहरे से
आँखें खुल जातीं ठंडक से रूह खिल जाती बूंदों सेखेलते रहते थे दिन भर सुध न रहती घर लौटने की
याद नहीं जाती दिल से बचपन के नादान दिनों कीवक्त का यारों क्या कहना यह तो एक परिंदा है
चार दशक हो गए हैं लेकिन आज भी यादें जिंदा हैं
सब वैसा है जाने कहाँ खो गयी रूह की वो सिरहन
ना वो नीम है ना अम्माजी न हुकू पंची का कलरवकोई जुगत बतला दो बचपन में फिर से लौटने की
याद नहीं जाती दिल से बचपन के नादान दिनों की