जितने पाँव पसारेगा तू उतना ही पछतायेगा
इतनी औकात तेरी खाट में सिमट जाएगाजिस रोज़ बुलावा आएगा मटकी में सिमट जायेगा
फिर संग मटकी के प्यारे मिट्टी में मिल जाएगाहल्का होकर चल बन्दे सर पे बोझ क्यों ढोता है
दुनिया की चकाचौंध में अपना आप क्यों खोता हैतुझसे पहले भी दुनिया में शाहे कलंदर आये थे
जुल्मो सितम से दुनिया जीत फूले नहीं समायें थे
वक़्त आखिरी पछताए कुछ साथ न लेने पाए थेहल्का होकर चल बन्दे सर पे बोझ क्यों ढोता है
दुनिया की चकाचौंध में अपना आप क्यों खोता हैबहुत हुए दिन ठहरे तुझको सफर बुलाता है
सब छोड़ उठा ले गठरी अपना नहीं कोई नाता है
आया था जब तू अकेला अकेले ही तो जाना हैजितने पाँव पसारेगा तू उतना ही पछतायेगा
इतनी औकात तेरी खाट में सिमट जाएगाजिस रोज़ बुलावा आएगा मटकी में सिमट जायेगा
फिर संग मटकी के प्यारे मिट्टी में मिल जाएगाहल्का होकर चल बन्दे सर पे बोझ क्यों ढोता है
दुनिया की चकाचौंध में अपना आप क्यों खोता है