श्याम और बनवारी दो बूढ़े दोस्त हैं
वे घूमने के तो शौक़ीन हैं मगर
ज़यादा मंहगी यात्रा के लिए
उनके पास पैसे नहीं हैं. इसलिए
वे दोनों किसी सस्ती यात्रा के
इंतज़ार में रहते हैं.एक दिन अचानक फ़ोन की घंटी बजती है,
श्याम ख़ुशी से कहता है
“अरे भाई बनवारी चल हमारी विश पूरी हुई है”
एक बस सर्विस है जो केवल 90 रुपये में
लेह लद्दाख की यात्रा करवा रही है
बस रात को दिल्ली से रवाना होगी, तैयार रहना!वे दोनों सही समय पर
कश्मीरी गेट बस स्टैंड पहुँच जाते हैं.
बस का रंग हरा है. जब वे दोनों अंदर जाते हैं
बस में बैठे यात्री उनको अजीब से लगते हैं
और उनको घूर रहे होते हैं.
वे दोनों बस में सबसे पीछे
अपनी सीटों पर बैठ जाते हैं.बस तेज़ गति से चलने लगती है.
रात भर यात्रा कर बस मनाली क्रॉस करती है
तो रास्ता एकदम सुनसान हो जाता है.अचानक दोनों दोस्त देखते हैं कि
सभी यात्री पीछे देख रहे हैं उन दोनों को
बस में घोषणा होती है कि
अंतिम सफर में आप सभी का स्वागत है.
यह बस सीधी परलोक को जाएगी.
आप सभी को अपना शरीर यहीं छोड़ना होगा.तभी वादियों में भयानक आवाज़ें
गूंजने लगतीं हैं और बिजली
चमंकने लगती है.
श्याम और बनवारी को पता चल जता है
कि उनके अलावा बस में सभी यात्री आत्माएं हैं
और वे भी अब अपनी अंतिम यात्रा पूरी करने को हैं.बस में ज़ोर ज़ोर से हंसी की वाज़ें सुनाई देती हैं
और साथ में
श्याम और बनवारी की चीखें.