एक अदद सरफिरी बेगम जैसे मौसम रंग बदल रहा है
कभी तपा देता गर्मी से कभी कम्बल कम पड़ रहा हैकभी पानी की चार बूंद छिड़क बादल चल लेता है
कभी तेज़ हवा का झोंका धूल उड़ा फुर्र हो लेता हैमौसम और बेगम दोनों ही भरी जवानी में अच्छे लगते हैं
मगर बुढ़ापे में दोनों बस मनमर्ज़ी हुकम झाड़ने लगते हैंवक़्त आता है जब दोनों दिल को केवल धुक धुक देते हैं
कुछ कह दो तो दिखाते हैं तेवर डरावना सा लुक देते हैंहमें तो यारो अपनों ही ने लूटा गैरों का अजी क्या कहिये
कंपा हमें दिया सर्दी ने जब गर्म कपडे बक्से में रख दिएबेगम शुरू में लाढ़ बिखेरती जो मांगो वही खिलाती थी
प्यार अपना वो पेट के रस्ते से हो दिल तक ले जाती थीअब बेगम थक जाती चल चल सिर्फ पेट तक आती है
खुद के लिए अब पकाती है जो वही हमें भी खिलाती हैकद्दू करेला घीया बैंगन टिंडा तोरई बीन्स शलगम
चिकन मटर-पनीर हलुआ-पूरी का बस सपने लेते हममौसम और बेगम दोनों बस अपनी ही ढपली बजाते हैं
सर्द-गर्म औ इश्क-विश्क से अब हम छुपकर जाते हैंक्या शिकवा किसी से कीजिये किस किस को रोईए
मौसम चिल है कड़क बेगम बस तान कम्बल सोईयेएक अदद सरफिरी बेगम जैसे मौसम रंग बदल रहा है
कभी तपा देता गर्मी से कभी कम्बल कम पड़ रहा है