चक्रव्यूह (Chakrvyooh)

अब करेंगे तब करेंगे फ़िक्र कल की कल करेंगे
वक़्त के पन्नें पलटते पिघल रही है ज़िन्दगी

कतरा कतरा लम्हा लम्हा बह रही है ज़िन्दगी
और अब कुछ बूंद बाकी बच गयी ये ज़िन्दगी

एक ताना बन चुके तो टूट जाते नये कई
तानेबाने जोड़ने में खाक हो गयी ज़िन्दगी

फिक्र अपनी है और फ़िक्रमंद अपनों के हम
बेतहाशा भागदौड़ कर थक गयी है ज़िन्दगी

हासिल हो हर शै हर चीज़ पर हो हक़ मेरा
हसरतों के दरमियाँ सिमट गयी है ज़िन्दगी

यार जिनकी दोस्ती का दम भरा करते थे हम
ली न खबर कब यार से हो गयी जुदा ज़िन्दगी

छोड़ गयी एक दिन सुबह थी हमें फुर्सत नहीं
माँ से भी तो मिल न पाये माँ से ही थी ज़िन्दगी

चाह कर भी कह न पाये हाल-ए-दिल उनसे सनम
ज़ख्म खून-ए-दिल से धोते घुल गयी यह ज़िन्दगी

चक्रव्यूह हमसे न टूटा हम तो अभिमन्यु हुए
जाल था खुद ही बिछाया उलझनों में ज़िन्दगी

शाम से होती सेहर और फिर से होती शाम है
रात दिन की कैद में है फड़फड़ाती ज़िन्दगी

टूटेंगी जंजीरें सारी पिंजरे सभी खुल जाएंगे
बन परिंदा एक दिन जब उड़ चलेगी ज़िन्दगी

एक दिन दीवार पर धुँधली सी एक तस्वीर बन
अनकहे किस्सों में ग़ुम हो जायेगी यह ज़िन्दगी

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