शाम हो चली है (Shaam Ho Chali Hai)

शाम हो चली है चलो आईने से नज़रें मिला लो
न काब उतार दो असलियत से हाथ मिला लो

मालूम ही है न तुम अंदर से कितने घिनौने हो
हर बुरा ऐब रखते तुम मासूमियत बेचते हो
दामन तुम्हारा देखो और भी मैला हो गया है
तुम्हारी करनी से लगभग मटमैला हो गया है
क्या हुआ, खुद से नज़रें नहीं मिला पाते हो
रुक कर सोचो कभी दोज़ख में गिरे जाते हो
क्या मुंह दिखाओगे कोई बहाना तो बना लो
शाम हो चली है चलो आईने से नज़रें मिला लो
न काब उतार दो असलियत से हाथ मिला लो

तुम ऐसे तो न थे इस कदर बर्बाद तो नहीं थे
किसकी चाहत में आखिर इतने अंधे हो गए
रोज एक नया झूठ हर रोज एक नई कहानी
तुम जैसे न जाने कितने आये और चले गए
पता है न कि खुद से सामना न कर पाओगे
खुद को कोसोगे तुम फिर थोड़ा पछताओगे
आसमां की ओर देखकर दो आंसू बहाओगे
कल फिर गुनाह के समंदर में डूब जाओगे
हाड़मांस के पुतले से कितने सितम कराने हैं
जबकि पता है देस पराया और लोग बेगाने हैं
उसकी मेहरबानियों का कुछ तो सिला दो
शाम हो चली है चलो आईने से नज़रें मिला लो

शाम हो चली है चलो आईने से नज़रें मिला लो
नकाब उतार दो असलियत से हाथ मिला लो

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