आदम और हौवा (Aadam aur Hauva)

आदम जंगल में घूमा करता था यहाँ वहां
पैरों के नीचे ज़मीन थी था ऊपर आसमां

बोलने को जुबां पर था उसकी हूँ और हां
डरता था कहीं आफत में न आ जाये जां

अक्लमंद वैसे तो हुआ करता था आदम
ज़रूरतें उसकी जीने को होती थी कम

एक दिन हौवा से उसका सामना हो गया
ज़िन्दगी में उसकी एक तूफां सा आ गया

अक्ल चली गयी हरी हरी घास चरने को
पलकों ने उसकी झपकना बंद कर दिया

सांस बाहर की बाहर बाकीअंदर रह गयी
धड़कन जैसे रेलगाड़ी का इंजन बन गयी

लब कहना चाहते थे कुछ लरजते रह गए
एक ही पल में आदम के तोते उड़ गए

ख़ूबसूरत हौवा थी आदम भी था जवान
इश्क़ के जाल में बेचारा फंस गया नादां

सब बदला पर आदम का किस्सा वही है
आज भी बोलती हौवा के आगे बंद ही है

बोलने को जुबां पर रहता है हूँ और हाँ
डरता है कहीं आफत में न आ जाये जां

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