आदम जंगल में घूमा करता था यहाँ वहां
पैरों के नीचे ज़मीन थी था ऊपर आसमांबोलने को जुबां पर था उसकी हूँ और हां
डरता था कहीं आफत में न आ जाये जांअक्लमंद वैसे तो हुआ करता था आदम
ज़रूरतें उसकी जीने को होती थी कमएक दिन हौवा से उसका सामना हो गया
ज़िन्दगी में उसकी एक तूफां सा आ गयाअक्ल चली गयी हरी हरी घास चरने को
पलकों ने उसकी झपकना बंद कर दियासांस बाहर की बाहर बाकीअंदर रह गयी
धड़कन जैसे रेलगाड़ी का इंजन बन गयीलब कहना चाहते थे कुछ लरजते रह गए
एक ही पल में आदम के तोते उड़ गएख़ूबसूरत हौवा थी आदम भी था जवान
इश्क़ के जाल में बेचारा फंस गया नादांसब बदला पर आदम का किस्सा वही है
आज भी बोलती हौवा के आगे बंद ही हैबोलने को जुबां पर रहता है हूँ और हाँ
डरता है कहीं आफत में न आ जाये जां