बुलाये मेरी कविता (Bulaye Meri Kavita)

पल पल तुम्हें है बुलाये मेरी कविता
दिल धड़काये लजाये मेरी कविता
देती राहत है यह सूने हर मन को
इत्र सी मन में समाये मेरी कविता

एहसास में थी बचपन से मेरे मन में
देती थी दस्तक दिल के नगर में
गीत बनकर जो कागज़ पर है उतरी
ता थैया नाच नचाये मेरी कविता

बोल होठों पर पहले न आते थे
लब लरजते थे पर रुक जाते थे
घाव गहरे जो दिल में दबे थे
फांस ग़मों की निकाले मेरी कविता

कभी बस गया था कोई मीत मन में
याद बन बस रह गया है जेहन में
नींद टूटी तो स्वप्न कांच टूट गए
मायूस दिल को समझाए मेरी कविता

हमदम बन कर है यह जीवन में आयी
सांस बनकर धड़कनो में समाई
जुदा होना दोनों का अब मुश्किल है
संग मेरी जां के जायेगी मेरी कविता

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