सब कुछ बदलने वाला था
मन कुछ दिन से भारी था
अपनों का भी था यही हाल
भावों में कोलाहल जारी थागीली आँखों को अपनी माँ
पल्लू से थी पोंछती बार बार
आँखों में बसाती लाडो को
एक बार और आखिरी बारसब तैयारी कर दी है तेरी
अच्छे से सब समझ लेना
संस्कार मिले हैं जो घर से
उन बातों पर ही तू चलनाशांत स्वभाव के थे पापा
बैठे सोफे थे में धंसे हुए
शून्य में निहारते जाते
सीने में समंदर भरे हुएमुस्कुराये कुछ देर तलक
जिह्वा को कुछ विराम दिया
हाथ फेर सर पर बेटी के
बाँध सब्र का थाम लिया