सौगंध (Saugandh)

कद्र न हो कद्रदान न हों विचलित तुमको नहीं होना है
सौगंध तुम्हें कविता मेरी पथभ्रष्ट कतई नहीं होना है

चलन में हैं वे रचनाएं गुणगान भ्रष्ट का करती हैं
जाति धर्म में उलझाकर उन्माद भीड़ में भरती हैं

दुष्प्रचार की कालिख में कलम को नहीं भिगोना है
सौगंध तुम्हें कविता मेरी पथभ्रष्ट कतई नहीं होना है

सच्चाई तेरे साथ रहे जन कल्याण सदा मन में
देश प्रेम सबसे ऊपर भारत के जन हों वर्णन में

मर्यादा के धागे को ही आशा में पिरोना है
सौगंध तुम्हें कविता मेरी पथभ्रष्ट कतई नहीं होना है
तुम कृष्ण जपो अल्लाह कहो राम भजो रहमान कहो
गीता के श्लोक आयते कुरान अमन बस बोली बोलो

व्यर्थ की टकराव में प्रिये धैर्य तुम्हें नहीं खोना है
सौगंध तुम्हें कविता मेरी पथभ्रष्ट कतई नहीं होना है

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